2022 का यूपी चुनाव अभी भी लोगों की जुबान पर है।गांव के चौपाल से लेकर शहर की चाय की दुकान तक, हर जगह यही चर्चा थी—मंदिर ने BJP को UP जिताया।राम मंदिर के मुद्दे ने वहां ऐसा माहौल बना दिया था कि बाकी सारे वादे और बहसें पीछे रह गईं।अब बिहार में भी उसी तरह की हलचल शुरू हो चुकी है।मंच है मिथिलांचल, और केंद्र में है सीता मंदिर—जहां से BJP एक नई कहानी लिखना चाहती है।

मिथिलांचल—जहां आस्था और राजनीति मिल रही है
मिथिलांचल का नाम लेते ही सिर्फ नक्शा नहीं, बल्कि यहां की परंपरा और संस्कृति भी सामने आती है।सीता माता की धरती होने के कारण यह इलाका धार्मिक भावनाओं से भरा हुआ है।BJP ने इस बार उसी आस्था को अपने पाले में खींचने का इरादा किया है।मंदिर में भव्य आयोजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और तीर्थ पर्यटन की नई योजनाएं—ये सब मिलकर एक ही संदेश दे रहे हैं:मंदिर ने BJP को UP जिताया, तो बिहार में भी यही रास्ता क्यों न अपनाया जाए।
कमंडल’ का कार्ड—सीधा लेकिन जोखिम भरा
उत्तर प्रदेश में ‘कमंडल’ की राजनीति खुले तौर पर खेली गई और फायदा भी मिला।लेकिन बिहार का मामला अलग है।यहां जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और छोटे-छोटे राजनीतिक गुट हर चुनाव को पेचीदा बना देते हैं।अगर नीतीश कुमार इस पहल का साथ देते हैं, तो NDA को बड़ा फायदा होगा।पर अगर वे दूरी बनाए रखते हैं, तो BJP को अकेले ही मैदान संभालना पड़ेगा।

नीतीश कुमार—खामोशी भी एक बयान
नीतीश कुमार को राजनीति में तौलमोल का उस्ताद माना जाता है।वे जानते हैं कि बिहार में सिर्फ धार्मिक मुद्दे पर चुनाव जीतना मुश्किल है।उनकी चुप्पी भी एक तरह का संदेश है—सही वक्त पर सही दांव खेलना।अगर वे इस धार्मिक एजेंडे का हिस्सा बनते हैं, तो सियासी समीकरण बदल सकते हैं, लेकिन विपक्ष का पलटवार भी तय है।
विपक्ष की कोशिश—धर्म से हटाकर मुद्दों पर लाना
विपक्ष इस पूरे अभियान को धर्म के सहारे राजनीति कहकर निशाना बना रहा है।उनका जोर रोजगार, शिक्षा और विकास पर रहेगा।लेकिन यह भी सच है कि अगर धार्मिक भावना जनता के बीच गहरी हो गई, तो बाकी मुद्दे पीछे छूट सकते हैं।और यही बात विपक्ष को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है।
बिहार बनाम यूपी—दो अलग तस्वीरें
यूपी में मंदिर का मुद्दा गेमचेंजर साबित हुआ, लेकिन बिहार की जमीन दूसरी है।यहां जातीय और सामाजिक समीकरण उतने ही मजबूत हैं जितना कोई धार्मिक मुद्दा।इसलिए यह सोचना कि मंदिर ने BJP को UP जिताया वाला फॉर्मूला यहां भी वैसे ही चलेगा, थोड़ा जल्दबाजी होगी।

आगे क्या?
मिथिलांचल से शुरू हुई यह लहर केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं है।यह चुनावी मौसम में बड़ा फैक्टर बन सकती है।अब देखना है कि यह हवा कितनी तेज चलती है और कहां जाकर थमती है।